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हिंदी व्याकरण एवं साहित्य

हिन्दी व्याकरण एवं साहित्य (अध्ययन नोट्स)

काव्य-बोध एवं भाषा-बोध

1. काव्य की परिभाषा एवं भेद

  • परिभाषाएँ:
    • “वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” — आचार्य विश्वनाथ
    • “रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्” — पं. जगन्नाथ

काव्य के भेद

काव्य
 ├── 1. दृश्य काव्य (नाटक, एकांकी)
 └── 2. श्रव्य काव्य
       ├── प्रबंध काव्य
       │     ├── महाकाव्य (उदा. रामचरितमानस, साकेत, कामायनी)
       │     └── खण्डकाव्य (उदा. यशोधरा, पंचवटी, उर्मिला)
       └── मुक्तक काव्य
             ├── पाठ्य मुक्तक (उदा. कबीर के पद)
             └── गेय मुक्तक (उदा. बिहारी के पद, सूरदास के पद)
  • प्रबंध काव्य: जिस काव्य में जीवन की जन्म से लेकर मृत्यु तक की घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन होता है।
  • मुक्तक काव्य: वह काव्य जिसके प्रत्येक पद का अपना स्वतंत्र अर्थ निकलता है, जो पूर्वापर संबंध से मुक्त होता है।

प्रबंध काव्य एवं मुक्तक काव्य में अन्तर

क्र.प्रबंध काव्यमुक्तक काव्य
1इसमें सम्पूर्ण जीवन का वर्णन होता है।इसके प्रत्येक पद का स्वतंत्र अर्थ होता है।
2इसका आकार बड़ा होता है।इसका आकार छोटा होता है।
3इसमें पात्रों की संख्या अधिक होती है।इसमें पात्र सीमित/कम होते हैं।

महाकाव्य एवं खण्डकाव्य में अन्तर

क्र.महाकाव्यखण्डकाव्य
1इसमें सम्पूर्ण जीवन का समग्र चित्रण होता है।इसमें जीवन की किसी एक घटना/अंश का चित्रण होता है।
2इसमें कम से कम 8 सर्ग होते हैं।इसमें एक या दो सर्ग (खण्ड) होते हैं।
3इसमें मुख्य कथा के साथ अनेक प्रासंगिक कथाएं होती हैं।इसमें केवल एक मुख्य कथा होती है।
4आकार बड़ा तथा पात्रों की संख्या अधिक होती है।आकार छोटा तथा पात्रों की संख्या सीमित होती है।

2. रस-विवेचन

  • परिभाषा: काव्य को पढ़ने, सुनने या देखने से जिस आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं।
    • “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः” — भरतमुनि
    • रस को काव्य की आत्मा कहा जाता है।

रस के 4 अंग (अवयव)

  1. स्थायी भाव: सहृदय के हृदय में सुप्त अवस्था में सदैव विद्यमान रहने वाले भाव। इनकी संख्या 10 है:
    • श्रृंगार — रति | हास्य — हास | वीर — उत्साह | करुण — शोक | रौद्र — क्रोध | भयानक — भय | वीभत्स — जुगुप्सा (घृणा) | अद्भुत — विस्मय | शान्त — निर्वेद | वात्सल्य — वत्सल
  2. विभाव: स्थायी भावों को जाग्रत करने वाले कारण। (2 भेद: आलम्बन विभाव एवं उद्दीपन विभाव)
    • आलम्बन: जिसके कारण भाव जाग्रत हो (उदा. शेर)। जिसके मन में जगे, वह आश्रय कहलाता है।
    • उद्दीपन: स्थायी भाव को तीव्र करने वाली चेष्टाएँ या वातावरण (उदा. सुनसान जंगल, अँधेरा)।
  3. अनुभाव: स्थायी भाव जागृत होने पर आश्रय की बाह्य शारीरिक चेष्टाएँ (उदा. काँपना, भागना)। (भेद: कायिक, वाचिक, आहार्य, सात्विक)
  4. संचारी (व्यभिचारी) भाव: स्थायी भाव को पुष्ट करने के लिए मन में पानी के बुलबुलों की तरह प्रकट और लुप्त होने वाले भाव। इनकी कुल संख्या 33 है (उदा. निर्वेद, ग्लानि, शंका, आलस्य, चिन्ता, मोह, आदि)।

प्रमुख रस एवं उनके उदाहरण

  • श्रृंगार रस (संयोग):“राम को रूप निहारति जानकी, कंकन के नग की परछाहीं। यातें सबै सुधि भूलि गयी, कर टेकि रही पल तारत नाहीं॥”
  • श्रृंगार रस (वियोग):“मैं नीर भरी दुख की बदली! उमड़ी कल थी मिट आज चली॥”
  • वीर रस:“हे सारथे! हैं द्रोण क्या, देवेन्द्र भी आकर अड़े। हैं खेल क्षत्रिय बालकों का व्यूह भेदन कर लड़े॥ मैं सत्य कहता हूँ सखे! सुकुमार मत जानो मुझे। यमराज से भी युद्ध में प्रस्तुत सदा जानो मुझे॥”
  • करुण रस:“अभी तो मुकुट बँधा था माथ, हुए कल ही हल्दी के हाथ। खुले भी न थे लाज के बोल, खिले भी न चुम्बन शून्य कपोल। हाय, रुक गया यही संसार, बना सिन्दूर अनल अंगार!”
  • रौद्र रस:“श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्रोध से जलने लगे। सब शोक अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥”
  • शान्त रस:“क्या भाग रहा तू भार देख? तू मेरी ओर निहार देख। मैं त्याग-चला निस्सार देख॥”
  • हास्य रस:“इस दौड़-धूप में क्या रखा है, आराम करो आराम करो। आराम ज़िन्दगी की कुंजी है, इससे न तपेदिक होती है॥”
  • अद्भुत रस:“इक अचंभा देख्यो रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावे गाई। जल की मछली तरुवर ब्याई, प Berkeley बिलाई मुरगै खाई॥”
  • भयानक रस:“नभ से झपटत बाज लखि, भूल्यो सकल प्रपंच। कंपित तन व्याकुल नयन, लावक हिल्यो न रंच॥”
  • वीभत्स रस:“रिपु आँतन की कुंडली करि, जोगिनी चबात। पिहँड़ी में पागी, मनो जुवति जलेबी खात॥”
  • वात्सल्य रस:“जसोदा हरि पालने झुलावै। हलरावै, दुलराइ, मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै॥”

3. अलंकार

परिभाषा: काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्वों/धर्मों को अलंकार कहते हैं।

  • भेद: 1. शब्दालंकार, 2. अर्थालंकार, 3. उभयालंकार

प्रमुख अर्थालंकार

  • वक्रोक्ति अलंकार: जहाँ वक्ता के कहे गए शब्दों का श्रोता जानबूझकर भिन्न अर्थ निकाले।
    • उदा. “को तुम? – ‘हैं घनश्याम हम।’ – ‘तो कितहूँ बरसो।'” / “कौन द्वार पर? – ‘हरि मैं राधे।’ – ‘क्या वानर का काम यहाँ?'”
  • दृष्टान्त अलंकार: जहाँ एक बात कहकर उससे मिलती-जुलती दूसरी बात द्वारा बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव दर्शाया जाए।
    • उदा. “एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं रह सकती हैं। / किसी और पर प्रेम नारियाँ, पति का क्या सह सकती हैं।”
  • उदाहरण अलंकार: जहाँ सामान्य बात कहकर ज्यों, जैसे, जिमि आदि वाचक शब्दों द्वारा उदाहरण दिया जाए।
    • उदा. “नीकी पै फीकी लगे, बिनु अवसर की बात। / जैसे बरनत युद्ध में, रस सिंगार न सुहात॥”
  • विशेषोक्ति अलंकार: जहाँ कारण उपस्थित होने पर भी कार्य का न होना पाया जाए।
    • उदा. “देखो दो-दो मेघ बरसते, मैं प्यासी की प्यासी।”
  • सांगरूपक अलंकार: जहाँ उपमेय पर उपमान के सभी अंगों का पूर्ण आरोप किया जाए।
    • उदा. “उदित उदय गिरि-मंच पर, रघुवर बाल-पतंग। / बिससे संत-सरोज सब, हरषे लोचन-भृंग॥”
  • भ्रान्तिमान अलंकार: जहाँ सादृश्य के कारण एक वस्तु को भूलवश पूर्ण निश्चय के साथ दूसरी वस्तु मान लिया जाए।
    • उदा. “जानि स्याम घनस्याम को नाच उठे वन मोर।” / “ओस बिन्दु चुग रही हंसिनी, मोती उनको जान।”
  • संदेह अलंकार: जहाँ रूप-रंग की समानता से अन्त तक संशय बना रहे कि वस्तु क्या है।
    • उदा. “नारी बीच सारी है कि सारी बीच नारी है। / कि नारी ही की सारी है कि सारी ही की नारी है॥”
  • विरोधाभास अलंकार: जहाँ वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास हो।
    • उदा. “या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोय। / ज्यों-ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय॥”
  • व्यतिरेक अलंकार: जहाँ उपमान की तुलना में उपमेय को गुण की अधिकता के कारण श्रेष्ठ दिखाया जाए।
    • उदा. “साधु ऊँचे सैल सम, किन्तु प्रकृति सुकुमार।”

4. छन्द

परिभाषा: वर्णों या मात्राओं की संख्या, यति, गति, तुक आदि नियमों से नियोजित पद-रचना छन्द कहलाती है।

  • मात्रा गणना के नियम:
    • लघु (।): ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ, ऋ) — 1 मात्रा।
    • गुरु (\varsigma): दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ), अनुस्वार (\dot{}), विसर्ग (:), एवं संयुक्त वर्ण से पूर्व का अक्षर — 2 मात्राएँ।
  • गण: तीन वर्णों के समूह को गण कहते हैं (कुल 8 गण)।
    • सूत्र: यमाताराजभानसलगा (यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण)।

प्रमुख छन्द

  • रोला (मात्रिक सम छन्द): प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ (11 और 13 पर यति)।
  • सोरठा (मात्रिक अर्धसम छन्द): दोहे का उलटा; विषम चरणों (1, 3) में 11-11 तथा सम चरणों (2, 4) में 13-13 मात्राएँ।
  • सवैया (वर्णिक छन्द): 22 से 26 वर्णों वाले वृत्त।
  • कवित्त (वर्णिक छन्द/दण्डक): प्रत्येक चरण में 31 वर्ण (16 और 15 वर्णों पर यति, अंतिम वर्ण गुरु)।
  • रुबाइयाँ: उर्दू-फारसी का छन्द (4 पंक्तियाँ; पहली, दूसरी व चौथी पंक्ति समतुकान्त, तीसरी भिन्न)।
  • मुक्तक छन्द: वर्ण या मात्रा के बंधनों से मुक्त रचना (उदा. निराला की कविताएँ)।

5. शब्द-गुण एवं काव्य-बिम्ब

  • शब्द-गुण: रस के उत्कर्ष और काव्य की शोभा बढ़ाने वाले नित्य धर्म। (3 प्रकार):
    1. माधुर्य गुण: चित्त को द्रवित व आह्लादित करने वाला कोमल वर्णों से युक्त गुण (श्रृंगार, शान्त व करुण रस में)।
    2. ओज गुण: मन में उत्साह, जोश और तेज उत्पन्न करने वाला गुण (वीर, रौद्र ও भयानक रस में)।
    3. प्रसाद गुण: जिसे पढ़ते ही अर्थ हृदयंगम हो जाए और मन प्रसन्न हो जाए (सभी रसों में)।
  • काव्य बिम्ब: शब्दार्थ के माध्यम से कल्पना द्वारा निर्मित मानसिक चित्र।
    • प्रकार: ऐन्द्रिय बिम्ब (चाक्षुष, श्रव्य, घ्राण, स्पर्श, स्वाद), काल्पनिक बिम्ब, प्रेरक अनुभूति बिम्ब।

6. शब्द शक्तियाँ

परिभाषा: शब्द में निहित अन्तर्निहित अर्थ को प्रकट करने वाले व्यापार को शब्द-शक्ति कहते हैं।

क्र.शब्द शक्तिप्रकट अर्थलक्षण / पहचानउदाहरण
1अभिधावाच्यार्थ (मुख्यार्थ)लोकप्रसिद्ध साधारण अर्थ का सीधा बोध।“भोपाल मध्य प्रदेश की राजधानी है।”
2लक्षणालक्ष्यार्थमुख्यार्थ में बाधा आने पर रूढ़ि या प्रयोजन के आधार पर ग्रहण अर्थ।“वह तो निरी गाय है।” / “भारत वीर है।”
3व्यंजनाव्यंग्यार्थमुख्यार्थ व लक्ष्यार्थ दोनों के शांत होने पर प्रसंगवश निकलने वाला गूढ़ अर्थ।“संध्या हो गई है।” / “घड़ी में दस बज गए।”

7. भाषा-बोध

  • भाषा: भावों और विचारों के पारस्परिक आदान-प्रदान का माध्यम।
  • बोली: किसी सीमित या स्थानीय क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा का अल्प-विकसित रूप।
  • क्षेत्रीय (देशज) शब्द: स्थानीय बोलियों से आवश्यकतानुसार भाषा में आए शब्द। (उदा. लोटा, डिबिया, थैला, टांग, झाड़ू, अंगोछा)
  • तकनीकी (पारिभाषिक) शब्द: किसी विशिष्ट विषय, विज्ञान, वाणिज्य या प्रशासन में निश्चित अर्थ में प्रयुक्त शब्द।
    • विज्ञान: पोषक, कोशिका, उत्तक | वाणिज्य: पूँजी, लेखापाल, अनुबंध | प्रशासन: अधिसूचना, अंतरिम, ज्ञापन
  • निपात शब्द: वाक्य में किसी शब्द पर विशेष बल देने के लिए प्रयुक्त अव्यय शब्द (उदा. ही, भी, तक, तो, केवल, मात्र)।
    • उदा. “मुझे भी किताब चाहिए।” / “रमेश केवल पढ़ रहा है।”

शब्द युग्म (6 प्रकार)

  1. पुनरुक्त शब्द युग्म: पास-पास, चलते-चलते, छोटे-छोटे
  2. समवर्गीय शब्द युग्म: पूजा-पाठ, भाग-दौड़, पशु-पक्षी
  3. समानार्थक शब्द युग्म: सुख-चैन, काम-काज, भूत-प्रेत
  4. विपरीतार्थक शब्द युग्म: जीवन-मरण, आकाश-पाताल, सुबह-शाम
  5. सार्थक-निरर्थक शब्द युग्म: रोटी-वोटी, चाय-वाय, पानी-वानी
  6. निरर्थक शब्द युग्म: अंड-बंड, अनाप-शनाप, हट्टा-कट्टा

1. वाक्य (Sentence)

परिभाषा: सार्थक शब्दों के व्यवस्थित समूह को वाक्य कहते हैं।

वाक्य के भेद

  1. रचना के आधार पर: सरल, मिश्रित, संयुक्त
  2. अर्थ के आधार पर (8 प्रकार): विधिवाचक, निषेधवाचक, आज्ञार्थक, प्रश्नवाचक, विस्मयादिबोधक, सन्देहवाचक, संकेतवाचक, इच्छावाचक
  3. क्रिया (वाच्य) के आधार पर: कर्तृप्रधान (कर्तृवाच्य), कर्मप्रधान (कर्मवाच्य), भावप्रधान (भाववाच्य)

रचना के आधार पर वाक्य

  • सरल वाक्य: जिस वाक्य में एक उद्देश्य (कर्ता) और एक विधेय (क्रिया) होता है, उसे सरल वाक्य कहते हैं।
    • उदाहरण:
      1. राम जाता है।
      2. बिजली चमकती है।
      3. पानी बरसा।
  • मिश्रित वाक्य: जिस वाक्य में एक प्रधान उपवाक्य एवं उसके अधीन आश्रित उपवाक्य होते हैं, जो आपस में कि, जो, क्योंकि, जैसा, जब, तब, तथापि, जितना, उतना, जैसा-वैसा, जहाँ-वहाँ, यदि आदि योजकों से जुड़े रहते हैं।
    • उदाहरण:
      1. सफल वही होता है जो परिश्रम करता है।
      2. जब वर्षा होती है तब खेत जोते जाते हैं।
      3. मेरा दृढ़ विश्वास है कि भारत जीतेगा।
  • संयुक्त वाक्य: जहाँ दो या दो से अधिक उपवाक्य मिले हों किंतु सभी वाक्य प्रधान हों, वह संयुक्त वाक्य होता है। यह उपवाक्य और, एवं, तथा, या, अथवा, इसलिए, अतः, तो, किंतु, परन्तु आदि योजक शब्दों से जुड़े रहते हैं।
    • उदाहरण:
      1. वह सुबह गया और शाम को लौट आया।
      2. उसने बहुत परिश्रम किया किंतु सफलता नहीं मिली।
      3. मैं आया और वह गया।

उपवाक्य (Clause)

परिभाषा: वाक्यों का ऐसा हिस्सा जिसका अपना खुद का अर्थ हो, जिसमें उद्देश्य एवं विधेय हो, उपवाक्य कहलाता है।

प्रकार (3 प्रकार):

  1. संज्ञा-उपवाक्य: वह उपवाक्य जो प्रधान उपवाक्य की संज्ञा या कारक के रूप में सहायता करे। (प्रायः ‘कि’ से जुड़ता है)
    • उदा. राम ने कहा कि मैं पढूँगा। / मैं नहीं जानता कि वह कहाँ है।
  2. विशेषण उपवाक्य: जो उपवाक्य किसी दूसरे उपवाक्य में आये संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता प्रकट करे।
    • उदा. यह वह कॉलेज है जहाँ से मैंने शिक्षा प्राप्त की। / वह विद्यार्थी जो कल अनुपस्थित था, बीमार है।
  3. क्रिया-विशेषण उपवाक्य: जो प्रधान उपवाक्य की क्रिया की विशेषता बताने वाले उपवाक्य को क्रिया-विशेषण उपवाक्य कहते हैं।
    • उदा. जब पानी बरसता है, तब खेत भीगे होते हैं। / राम ने कठिन परिश्रम किया तब परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ।

2. अर्थ के आधार पर वाक्य भेद (8 प्रकार)

क्र.भेदउदाहरण
1विधिवाचकराम मेरे घर आया।
2निषेधवाचकराम मेरे घर नहीं आया।
3आज्ञार्थकराम मेरे घर आओ और मिलो।
4प्रश्नवाचकक्या राम आया था?
5इच्छाबोधकअच्छा हो कि राम मेरे घर आये।
6सन्देहवाचकराम जरूर मेरे घर आया होगा।
7संकेतवाचकयदि राम जानता तो जरूर मेरे घर आता।
8विस्मयादिबोधकहाय राम! यह क्या कर दिया!

3. मुहावरे एवं लोकोक्तियाँ

  • मुहावरा: वह वाक्यांश जो साधारण अर्थ से परे कुछ विशिष्ट अर्थ प्रकट करते हैं, मुहावरे कहलाते हैं।
  • लोकोक्ति: वह लोक-प्रचलित उक्ति जो वक्ता के कथन को अधिक तीव्र एवं प्रभावोत्पादक बनाती है, लोकोक्ति कहलाती है।

मुहावरे और लोकोक्ति में अन्तर:

  1. मुहावरा वाक्यांश है, जबकि लोकोक्ति पूर्ण वाक्य होती है।
  2. मुहावरा किसी वाक्य के साथ जुड़कर ही अपना अर्थ व्यक्त करता है, जबकि लोकोक्ति अपने आप में पूर्ण होती है।
  3. मुहावरे के प्रयोग में चमत्कार प्रदर्शन का भाव रहता है, जबकि लोकोक्ति विषय की सत्यता एवं स्पष्टता को प्रमाणित करती है।

4. मातृभाषा, राजभाषा एवं राष्ट्रभाषा

  • मातृभाषा: माता (परिवार) के द्वारा बोली जाने वाली भाषा मातृभाषा कहलाती है। (उदा. हिन्दी)
  • राजभाषा: राजकीय (प्रशासनिक/सरकारी) कार्यों में प्रयुक्त होने वाली भाषा राजभाषा कहलाती है।
    • विशेषताएँ: राजकीय कामकाज की भाषा; मान्यता मिलने से महत्व अधिक।
  • राष्ट्रभाषा: जो भाषा सम्पूर्ण राष्ट्र में बोली और समझी जाती है, उसे राष्ट्रभाषा कहते हैं।
    • विशेषताएँ: विकसित होती है; बहुसंख्यक लोगों की भाषा होती है; संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त।

5. हिन्दी साहित्य का इतिहास (पद्य साहित्य)

  • आरम्भ: वास्तविक आरम्भ 993 ई. से माना जाता है।
  • हिन्दी भाषा का पहला कवि: सरहपा (769 ई., ‘दोहाकोश’)
  • हिन्दी भाषा की पहली रचना: देवसेन कृत ‘श्रावकाचार’ (933 ई.)

काल-विभाजन एवं नामकरण

1. आदिकाल (वीरगाथा काल)   : 993 ई. – 1318 ई. (1000 – 1350 ई.)
2. भक्तिकाल (पूर्वमध्य काल) : 1318 ई. – 1643 ई. (1350 – 1650 ई.)
3. रीतिकाल (उत्तरमध्य काल)  : 1643 ई. – 1850 ई. (1650 – 1850 ई.)
4. आधुनिक काल              : 1850 ई. – आज तक

(क) आदिकाल (वीरगाथा काल: 993–1318 ई.)

  • प्रवृत्तियाँ: आश्रयदाताओं की प्रशंसा, युद्धों का सजीव चित्रण, वीर एवं श्रृंगार रस की प्रधानता।
  • प्रमुख कवि एवं रचनाएं:
    • चन्दबरदाई — पृथ्वीराज रासो
    • नरपति नाल्ह — बीसलदेव रासो
    • जगनिक — परमाल रासो (आल्हाखण्ड)
    • विद्यापति — पदावली
    • अमीर खुसरो — पहेलियाँ

(ख) भक्तिकाल (पूर्वमध्यकाल: 1318–1643 ई.)

  • प्रवृत्तियाँ: ईश्वर भक्ति, गुरु महिमा, समन्वय की भावना, बाह्य आडम्बरों का विरोध।

भक्तिकालीन साहित्य का वर्गीकरण

मुख्य शाखाउप-शाखाएँ
1. निर्गुण काव्य धारा1. संत काव्य (ज्ञानाश्रयी) 2. प्रेम काव्य (प्रेमाश्रयी)
2. सगुण काव्य धारा1. राम काव्य (रामाश्रयी) 2. कृष्ण काव्य (कृष्णाश्रयी)

प्रमुख शाखाएँ, कवि एवं उनकी रचनाएँ

काव्य धारा / शाखाकविप्रमुख रचनाएँ
संत काव्यकबीरबीजक
रैदासरैदास के पद
प्रेम काव्यजायसीपद्मावत
मंझनमधुमालती
राम काव्यतुलसीदासरामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली
नाभादासभक्तमाल
कृष्ण काव्यसूरदाससूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी
मीराबाईनरसी जी का मायरा, गीत गोविंद की टीका
रसखानप्रेमवाटिका
रहीमदोहावली

(ग) रीतिकाल (उत्तरमध्यकाल: 1643–1850 ई.)

  • ‘रीति’ शब्द का अर्थ: रीति, विधि, परम्परा। यहाँ लक्षण ग्रन्थों के अर्थ में प्रयुक्त।
  • प्रवृत्तियाँ: लक्षण ग्रंथों का निर्माण, श्रृंगार रस की प्रधानता, दरबारी संस्कृति की प्रधानता, नायक-नायिका भेद।
  • वर्गीकरण:
    1. रीतिबद्ध कवि: केशवदास (रामचन्द्रिका – रीतिकाल के प्रवर्तक), मतिराम (ललित ललाम), देव (भाव विलास)
    2. रीतिसिद्ध कवि: बिहारी (बिहारी सतसई), सेनापति (कवित्त रत्नाकर)
    3. रीतिमुक्त कवि: घनानन्द (सुजान सागर, विरह लीला), आलम (आलमकेलि)

(घ) आधुनिक काल के उपकाल

1. भारतेन्दु युग (1850 – 1900 ई.)

  • प्रवृत्तियाँ: राष्ट्रीयता की भावना, सामाजिक चेतना का विकास, अंग्रेजी शिक्षा का विरोध, हास्य-व्यंग्य शैली।
  • कवि व रचनाएँ:
    • भारतेन्दु हरिश्चन्द्र — प्रेम सरोवर, प्रेम फुलवारी
    • प्रतापनारायण मिश्र — मन की लहर, लोकोक्ति शतक
    • राधाचरण गोस्वामी — नवभक्तमाल

2. द्विवेदी युग (1900 – 1920 ई.)

  • प्रवृत्तियाँ: खड़ी बोली का परिमार्जित रूप, अन्धविश्वासों एवं रूढ़ियों का विरोध, वर्णन-प्रधान कविताएँ, समाज सुधार की भावना।
  • कवि व रचनाएँ:
    • महावीर प्रसाद द्विवेदी — काव्य मंजूषा, सुमन
    • अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ — प्रिय प्रवास, वैदेही वनवास
    • मैथिलीशरण गुप्त — साकेत, यशोधरा, पंचवटी, भारत-भारती
    • माखनलाल चतुर्वेदी — हिमकिरीटिनी, हिमतरंगिनी

3. छायावाद (1920 – 1936 ई.)

  • परिभाषा: “स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह ही छायावाद है।” — डॉ. नगेन्द्र
  • छायावाद के 4 आधार स्तम्भ: प्रसाद, पन्त, निराला, महादेवी वर्मा
  • प्रवृत्तियाँ: वेदना और करुणा की अधिकता, प्रकृति का मानवीकरण, अज्ञात सत्ता के प्रति प्रेम (रहस्यवाद), श्रृंगार की भावना, व्यक्तिवाद की प्रधानता।
  • कवि व रचनाएँ:
    • जयशंकर प्रसाद — कामायनी, लहर, आँसू, झरना
    • सुमित्रानंदन पंत — पल्लव, ग्रंथि, गुंजन, वीणा
    • सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ — अनामिका, परिमल, गीतिका
    • महादेवी वर्मा — यामा, नीहार, रश्मि, नीरजा
    • डॉ. रामकुमार वर्मा — चित्ररेखा, निशीथ

छायावाद और रहस्यवाद में अन्तर

  • रहस्यवाद की परिभाषा: “चिंतन के क्षेत्र में जो अद्वैतवाद है, भावना के क्षेत्र में वही रहस्यवाद है।” — आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
आधारछायावादरहस्यवाद
प्रधानताकल्पना की प्रधानताचिन्तन की प्रधानता
दृष्टिकोणभावना की प्रधानताज्ञान व बुद्धितत्त्व की प्रधानता
प्रकृतिमूल में प्रकृति का सौन्दर्यप्रकृति दार्शनिक होती है

4. प्रगतिवाद (1936 – 1943 ई.)

(कार्ल मार्क्स के साम्यवाद से प्रभावित)

  • प्रवृत्तियाँ: शोषकों के प्रति विद्रोह व शोषितों के प्रति सहानुभूति, सामाजिक यथार्थ का चित्रण, ईश्वर के प्रति अनास्था, नारी शोषण के विरुद्ध मुक्ति का स्वर।
  • कवि व रचनाएँ:
    • नागार्जुन — युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, प्यासी पथराई आँखें
    • शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ — हिल्लोल, जीवन के गान
    • केदारनाथ अग्रवाल — नींद के बादल, फूल नहीं रंग बोलते हैं
    • त्रिलोचन — धरती, मिट्टी की बारात

5. प्रयोगवाद (1943 – 1950 ई.)

(प्रवर्तक: सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’)

  • प्रवृत्तियाँ: प्रेम-भावना का खुला चित्रण, अहं की प्रधानता, बुद्धिवाद की प्रधानता, नवीन प्रतीकों एवं उपमानों का प्रयोग।
  • कवि व रचनाएँ:
    • अज्ञेय — हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इन्द्रधनुष रौंदे हुए ये
    • मुक्तिबोध — चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक-धूली
    • धर्मवीर भारती — ठंडा लोहा, अंधा युग, कनुप्रिया
    • सर्वेश्वर दयाल सक्सेना — काठ की घंटियाँ, बांस का पुल

6. नई कविता (1950 से आज तक)

  • प्रवृत्तियाँ: कुंठा, संत्रास की कविता; लघु मानव की प्रतिष्ठा; क्षणवाद की महत्ता; व्यंग्य-प्रधान रचनाएँ।
  • कवि व रचनाएँ:
    • शमशेर बहादुर सिंह — इतने पास अपने, बात बोलेगी
    • कुँवर नारायण — चक्रव्यूह, आमने-सामने
    • दुष्यन्त कुमार — सूर्य का स्वागत, साये में धूप
    • भवानी प्रसाद मिश्र — गीत-फ़रोश, सन्नाटा
    • रघुवीर सहाय — आत्महत्या के विरुद्ध, हँसो-हँसो जल्दी हँसो

6. हिन्दी गद्य साहित्य का इतिहास

  • विकास: वास्तविक विकास सन् 1850 से भारतेन्दु युग से माना जाता है।
  • प्राचीन गद्य ग्रन्थ: भक्तमाल (नाभादास), चौरासी वैष्णवन की वार्तादो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता (गोकुलनाथ), पंचतंत्र की कहानियाँ
  • आरम्भिक गद्य रचनाकार:
    1. मुंशी सदासुख लाल — सुखसागर
    2. लल्लू लाल — प्रेमसागर
    3. इंशा अल्ला खाँ — रानी केतकी की कहानी
    4. सदल मिश्र — नासिकेतोपाख्यान

गद्य की प्रमुख एवं गौण विधाएँ

  • प्रमुख विधाएँ: निबंध, नाटक, एकांकी, कहानी, उपन्यास, आलोचना।
  • गौण विधाएँ: संस्मरण, रेखाचित्र, जीवनी, आत्मकथा, रिपोर्ताज, यात्रावृत्त, भेंटवार्ता, डायरी, पत्र साहित्य, गद्य काव्य।

7. गद्य की प्रमुख विधाओं का विस्तृत परिचय

(1) निबंध

  • परिभाषा: “गद्य कवियों की कसौटी है, तो निबंध गद्य की।” — आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
  • निबंध के भेद (4 प्रकार):
    1. विचारात्मक — विचारों की प्रधानता
    2. वर्णनात्मक — विषय के बाह्य रूप का वर्णन
    3. विवरणात्मक — किसी घटना, यात्रा या स्थान का विवरण
    4. भावात्मक — भाव/अनुभूति की प्रधानता
  • निबंध की शैलियाँ: व्यास शैली, समास शैली, विवेचन शैली, व्यंग्य शैली, आवेश शैली, संलाप शैली, प्रलाप शैली, आगमन-निगमन शैली।
  • काल विभाजन:
    1. भारतेन्दु युग (1850–1900): भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (एक अद्भुत अपूर्व स्वप्न), प्रतापनारायण मिश्र (परीक्षा, वृद्ध), बालमुकुन्द गुप्त (शिवशंभु का चिट्ठा), बालकृष्ण भट्ट (बातचीत, चन्द्रोदय)।
    2. द्विवेदी युग (1900–1920): महावीर प्रसाद द्विवेदी (साहित्य की महत्ता), सरदार पूर्ण सिंह (आचरण की सभ्यता, मजदूरी और प्रेम), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी (कछुआ धर्म, मारेसि मोहिं कुठाँव)।
    3. शुक्ल युग (1920–1940): आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (चिंतामणि भाग 1-2, क्रोध, उत्साह), बाबू गुलाबराय (ठलुआ क्लब, मेरी असफलताएं), शांतिप्रिय द्विवेदी (कवि और काव्य)।
    4. शुक्लोत्तर युग (1940 से आगे): डॉ. नगेन्द्र (विचार और अनुभूति), नन्ददुलारे वाजपेयी (नया साहित्य), विद्यानिवास मिश्र (चितवन की छाँह, तुम चंदन हम पानी), हजारी प्रसाद द्विवेदी (अशोक के फूल, कुटज)।
    • ललित निबंधकार: हजारी प्रसाद द्विवेदी, विद्यानिवास मिश्र।

(2) नाटक

  • परिभाषा: नाटक ऐसी अभिनय-परक विधा है, जिसमें सम्पूर्ण मानव जीवन का रोचक वर्णन होता है।
  • नाटक के तत्व (7 तत्व): कथानक, कथोपकथन (संवाद), पात्र एवं चरित्र-चित्रण, देशकाल और वातावरण (संकलन त्रय), भाषा-शैली, उद्देश्य, अभिनेता।
  • नाटककार: जयशंकर प्रसाद (नाटक सम्राट — चन्द्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, स्कन्दगुप्त), भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (प्रेम जोगिनी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति), जगदीशचन्द्र माथुर (कोणार्क, शारदीया), मोहन राकेश (आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस), विष्णु प्रभाकर (डॉक्टर, टूटते परिवेश)।

(3) एकांकी

  • परिभाषा: “एकांकी में एक ऐसी घटना रहती है जिसका जिज्ञासापूर्ण एवं कौतूहलमय नाटकीय शैली में चरम विकास होकर अन्त होता है।” — डॉ. रामकुमार वर्मा
  • एकांकी का प्राण तत्व: संघर्ष।
  • प्रथम आधुनिक एकांकी: एक घूँट (1930 ई., जयशंकर प्रसाद)।
  • प्रमुख एकांकीकार: राधाचरण गोस्वामी (भारत माता), जयशंकर प्रसाद (एक घूँट), डॉ. रामकुमार वर्मा (दीपदान, बादल की मृत्यु), सेठ गोविन्द दास (सप्त रश्मि), धर्मवीर भारती (नदी प्यासी थी)।

(4) उपन्यास

  • परिभाषा: “युग की गतिशील पृष्ठभूमि पर सहज ढंग में स्वाभाविक जीवन की एक पूर्ण झांकी प्रस्तुत करने वाला गद्य उपन्यास कहलाता है।” — डॉ. भागीरथ मिश्र
  • हिन्दी का प्रथम उपन्यास: परीक्षा गुरु (1882 ई., लाला श्रीनिवास दास)।
  • उपन्यास सम्राट: मुंशी प्रेमचन्द।
  • उपन्यासकार एवं रचनाएँ:
    • प्रेमचन्द — गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला
    • वृन्दावनलाल वर्मा — मृगनयनी, गढ़ कुण्डार, विराटा की पद्मिनी
    • हजारी प्रसाद द्विवेदी — बाणभट्ट की आत्मकथा
    • जैनेन्द्र — परख, सुनीता, कल्याणी
    • यशपाल — झूठा सच, दादा कामरेड
    • फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (आंचलिक उपन्यासकार) — मैला आँचल, परती परिकथा, जुलूस

(5) कहानी

  • परिभाषा: “कहानी एक ऐसी रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या मनोभाव को प्रदर्शित करना ही कहानीकार का उद्देश्य होता है।” — मुंशी प्रेमचन्द
  • कहानी के तत्व (6 तत्व): कथानक, कथोपकथन, पात्र एवं चरित्र-चित्रण, देशकाल और वातावरण, भाषा-शैली, उद्देश्य।
  • हिन्दी की प्रथम कहानी: इन्दुमती (1900 ई., किशोरीलाल गोस्वामी)। अन्य प्रारम्भिक कहानियाँ: प्लेग की चुड़ैल (1902, लाला भगवानदीन), ग्यारह वर्ष का समय (1903, रामचन्द्र शुक्ल)।
  • प्रमुख कहानीकार: प्रेमचन्द (पंच परमेश्वर, ईदगाह, कफ़न, पूस की रात, बूढ़ी काकी, शतरंज के खिलाड़ी), जयशंकर प्रसाद (आकाशदीप, पुरस्कार, आँधी, इन्द्रजाल), चन्द्रधर शर्मा गुलेरी (उसने कहा था, सुखमय जीवन), जैनेन्द्र (पाजेब, फाँसी, नीलम देश की राजकन्या), विशम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ (ताई, रक्षाबंधन), यशपाल (परदा), फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ (तीसरी कसम, संवदिया)।

(6) आलोचना

  • परिभाषा: “यदि साहित्य जीवन की व्याख्या है तो आलोचना उस व्याख्या की व्याख्या।” — डॉ. श्याम सुन्दर दास
  • प्रमुख आलोचक:
    • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल — रस मीमांसा, भ्रमरगीत सार, जायसी ग्रंथावली
    • नन्ददुलारे वाजपेयी — नया साहित्य: नये प्रश्न
    • हजारी प्रसाद द्विवेदी — हिन्दी साहित्य की भूमिका
    • डॉ. नगेन्द्र — रस सिद्धान्त
    • डॉ. नामवर सिंह — कविता के नए प्रतिमान
    • डॉ. रामविलास शर्मा — प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ

(7) आत्मकथा

  • परिभाषा: आत्मकथा में लेखक स्वयं के जीवन की कथा को पूरी निष्पक्षता और सच्चाई के साथ प्रस्तुत करता है।
  • प्रमुख आत्मकथाकार:
    • भारतेन्दु हरिश्चन्द्र — कुछ आप बीती, कुछ जग बीती
    • गुलाबराय — मेरी असफलताएं
    • महात्मा गाँधी — सत्य के प्रयोग
    • वियोगी हरि — मेरा जीवन प्रवाह
    • हरिवंश राय बच्चन — क्या भूलूँ क्या याद करूँ

(8) अन्य गौण विधाएँ

  • जीवनी: जब लेखक किसी व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक की सभी घटनाओं को सच्चाई के साथ प्रस्तुत करता है।
    • विष्णु प्रभाकर — आवारा मसीहा (शरतचन्द्र की जीवनी)
    • अमृतराय — कलम का सिपाही (प्रेमचन्द की जीवनी)
    • रामविलास शर्मा — निराला की साहित्य साधना
    • शांति जोशी — पंत की जीवनी
  • रिपोर्ताज: किसी विषय का आँखों देखा या कानों सुना वर्णन इतने प्रभावशाली ढंग से किया जाता है कि उसकी अमिट छाप हृदय पटल पर अंकित हो जाती है।
    • शिवदान सिंह चौहान — लक्ष्मीपुरा (हिन्दी का पहला रिपोर्ताज)
    • रांगेय राघव — तूफानों के बीच
    • धर्मवीर भारती — युद्ध यात्रा
    • कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ — क्षण बोले कण मुस्काए
    • शमशेर बहादुर सिंह — प्लाट का मोर्चा
  • संस्मरण: जब लेखक अनुभूत की गई घटनाओं अथवा किसी व्यक्ति या वस्तु का मार्मिक वर्णन अपनी स्मृति के आधार पर करता है।
    • महादेवी वर्मा — अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएं
    • शिवरानी देवी — प्रेमचन्द घर में
    • सेठ गोविन्द दास — स्मृति कण
    • उपेन्द्रनाथ अश्क — मंटो: मेरा दुश्मन
    • अमृतलाल नागर — जिनके साथ जिया
  • रेखाचित्र: जब लेखक किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना का शब्दों के माध्यम से ऐसा कलात्मक वर्णन करता है कि आँखों के सामने चित्र सा उपस्थित हो जाता है।
    • महादेवी वर्मा — अतीत के चलचित्र, पथ के साथी
    • रामवृक्ष बेनीपुरी — माटी की मूरतें, गेहूँ और गुलाब, लाल तारा
    • प्रकाशचन्द्र गुप्त — पुरानी स्मृतियाँ
    • विनय मोहन शर्मा — रेखाएँ और रंग
  • यात्रा साहित्य: डॉ. रामविलास शर्मा (चिरंतन पथिक), विनय मोहन शर्मा (दक्षिण भारत की एक झलक)।
  • डायरी: डॉ. धीरेन्द्र वर्मा (मेरी कॉलेज डायरी)। अन्य: रामधारी सिंह दिनकर, शमशेर बहादुर सिंह, इलाचन्द्र जोशी, मोहन राकेश।
  • भेंटवार्ता: पद्मसिंह शर्मा ‘कमलेश’, रणवीर रांग्रा, राजेन्द्र यादव, लक्ष्मीचन्द्र जैन।
  • पत्र साहित्य: आनन्द कौसल्यायन (भिक्षु के पत्र), धीरेन्द्र वर्मा (यूरोप के पत्र), बनारसीदास चतुर्वेदी, ब्रजेन्द्र शर्मा (फाइल और प्रोफाइल)।
  • गद्य काव्य: राय कृष्णदास (साधना संग्रह), वियोगी हरि (भावना, अंतर्नाद)। अन्य: रामकुमार वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी, माखनलाल चतुर्वेदी, रघुवीर सिंह (शेष स्मृतियाँ)।

8. प्रमुख विधाओं में तुलनात्मक अन्तर

(क) नाटक और एकांकी / उपन्यास और कहानी में अन्तर

क्र.नाटक / उपन्यासएकांकी / कहानी
1इसका आकार बड़ा होता है।इसका आकार छोटा होता है।
2पात्रों की संख्या अधिक होती है।पात्रों की संख्या सीमित होती है।
3पढ़ने/देखने में अधिक समय लगता है।कम समय (आधे-एक घण्टे) में समाप्त हो जाती है।
4नाटक में अनेक अंक होते हैं; उपन्यास में विस्तृत जीवन होता है।एकांकी में एक अंक होता है; कहानी में जीवन का एक अंश होता है।

(ख) जीवनी और आत्मकथा में अन्तर

क्र.जीवनी (Biography)आत्मकथा (Autobiography)
1जीवनी किसी अन्य महापुरुष पर आधारित होती है।आत्मकथा स्वयं के जीवन पर आधारित होती है।
2यह पूर्णतः सत्य घटनाओं पर आधारित होती है।इसमें आत्मानुभूति के साथ कुछ अंश काल्पनिक/भावात्मक हो सकते हैं।
3इसमें तथ्यों एवं विवरण पर विशेष ध्यान रहता है।इसमें आत्मानुभूति और आत्म-निरीक्षण की गहराई होती है।

(ग) रेखाचित्र और संस्मरण में अन्तर

क्र.रेखाचित्र (Sketch)संस्मरण (Memoir)
1रेखाचित्र किसी सामान्य व्यक्ति का भी हो सकता है।संस्मरण प्रायः किसी विशिष्ट व्यक्ति का ही होता है।
2यह चरित्र-प्रधान एवं चित्रात्मक होता है।यह स्मृति एवं यथार्थ-प्रधान होता है।
3इसमें लेखक पूर्णतः तटस्थ रहता है।संस्मरण व्यक्तिपरक एवं आत्मीय होता है।